आखिर क्यूँ......
हिंदोस्तान में रह कर भी ' हिन्दी - दिवस ' क्यों मनाएँ ?
क्यूँ अपने आप को यह जताएँ -
कि जोअपनी माँ है ,
वह बेगानी नहीं , अपनी है
हमें उसे अपननाना है ,
और देश को आगे बढ़ाना है ।
क्या हुआ जो लंगड़ा रही है,
फिर भी बेवजह मुस्करा रही है ,
हर गोद के हर आंचल को सहला रही है,
घर - घर को महका रही है ।
माना आर्थिक तंगहाली उसका नसीब है ,
फिर भी हर दिल के करीब है,
युगों से उस की दास्तां कुछ अजीब है,
नारी के जैसा उस का नसीब है।
बार - बार होते हैं उस पर प्रहार
पर सोना तप के ही कुन्दन बनता है हर बार !!!
श्यामा शर्मा नाग
हिंदोस्तान में रह कर भी ' हिन्दी - दिवस ' क्यों मनाएँ ?
क्यूँ अपने आप को यह जताएँ -
कि जोअपनी माँ है ,
वह बेगानी नहीं , अपनी है
हमें उसे अपननाना है ,
और देश को आगे बढ़ाना है ।
क्या हुआ जो लंगड़ा रही है,
फिर भी बेवजह मुस्करा रही है ,
हर गोद के हर आंचल को सहला रही है,
घर - घर को महका रही है ।
माना आर्थिक तंगहाली उसका नसीब है ,
फिर भी हर दिल के करीब है,
युगों से उस की दास्तां कुछ अजीब है,
नारी के जैसा उस का नसीब है।
बार - बार होते हैं उस पर प्रहार
पर सोना तप के ही कुन्दन बनता है हर बार !!!
श्यामा शर्मा नाग
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