Monday, 27 January 2020

एक टीस

मेरे बीते पलों की व्यथा कह लो
कथा कह लो
या फ़लसफ़ा कह लो
जिस पल के आग़ोश में
संवेदना मेरी
डूबती उतराती रही
न चाह कर भी
वक़्त के थपेड़े को सहलाती रही

संवेदना
पहेली है मेरे लिए
बार - बार कुंद होने पर भी
इठलाती है मुस्कुराती है
मेरे दामन में ख़ुशियाँ लाती है
जानते हुए भी किसी दिन मात खाएगी
हल्की बयार भी न झेल पाएगी।

दिल का सकून
तख़्तोताज़ के माफ़िक़
बैठा है बंद कोने में
झंझवातों को झेलता हुआ
पल हर पल
देता है भरोसा नया

आत्मदाह संवेदनाओं का
पल-पल बदलते चेहरे
परत दर परत खुलते चले जाते हैं
और तभी
आँखों की नमी
तबदील होती जाती है हँसी में

क्या यही सार है ज़िंदगी का
या ज़िंदगी है कुछ और

ज़िंदगी असंभव तो नहीं, कठिन ज़रूर है
इस पर भी इंसान को इतना ग़रूर है

श्यामा

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