Monday, 27 January 2020

एक टीस

मेरे बीते पलों की व्यथा कह लो
कथा कह लो
या फ़लसफ़ा कह लो
जिस पल के आग़ोश में
संवेदना मेरी
डूबती उतराती रही
न चाह कर भी
वक़्त के थपेड़े को सहलाती रही

संवेदना
पहेली है मेरे लिए
बार - बार कुंद होने पर भी
इठलाती है मुस्कुराती है
मेरे दामन में ख़ुशियाँ लाती है
जानते हुए भी किसी दिन मात खाएगी
हल्की बयार भी न झेल पाएगी।

दिल का सकून
तख़्तोताज़ के माफ़िक़
बैठा है बंद कोने में
झंझवातों को झेलता हुआ
पल हर पल
देता है भरोसा नया

आत्मदाह संवेदनाओं का
पल-पल बदलते चेहरे
परत दर परत खुलते चले जाते हैं
और तभी
आँखों की नमी
तबदील होती जाती है हँसी में

क्या यही सार है ज़िंदगी का
या ज़िंदगी है कुछ और

ज़िंदगी असंभव तो नहीं, कठिन ज़रूर है
इस पर भी इंसान को इतना ग़रूर है

श्यामा
एक और गाँधी

क्रांति की लहर चलती रहे ,
क्रांति से दुनिया बदलती रहे ,
मैं रहूँ न रहूँ मशाल जलती रहे ।

न चाह है न तृषा है ,
न मन में कोई ग़ुबार है ,
मुझे कुछ न चाहिए
मेरे पास लोगों का प्यार है ,
अब गूँगे और बहरे लोगों का नहीं है देश ,
बयार आज़ादी की चलती रहे
मैं रहूँ न रहूँ मशाल जलती रहे ।

अपने लिए जंग लड़ते हैं सभी ,
ग़ैरों के लिए कुछ करो तो कभी ,
ख़ौफ़नाक सायों से डरना मत कभी ,
अटल इरादों से लड़ना है अभी ,
दिल में ख़्वाहिशें मचलती रहें ,
मैं रहूँ न रहूँ मशाल जलती रहे ।

सत्य और अहिंसा का रास्ता बताया था किसी ने ,
अग्निपथ का बिगुल बजाया था किसी ने ,
तख़्तोताज़ को पलट कर हिलाया था किसी ने ,
ऐसी महा -आत्माएँ उतरती रहें
मैं रहूँ न  रहूँ मशाल जलती रहे ।

विरासत देश की संभालना है तुम्हें ,
बेग़ैरत समझौतों से नहीं बहलना है तुम्हें ,
भ्रष्टाचार की महामारी को भगाना है तुम्हें ,
बस तमन्नाओं की आँधी चलती रहे ,
मैं रहूँ न रहूँ मशाल जलती रहे ।

निराशा के बादल भी फट जाएँगे कभी ,
आशाओं के इंद्रधनुष भी निकल आएँगे कभी ,
ज़िंदगी के पल भी हसीन हो जाएँगे कभी ,
बस उम्मीदों की लौ दहकती रहे ,
मैं रहूँ न रहूँ मशाल जलती रहे ।


श्यामा 

Tuesday, 1 January 2019

शिक्षक के मन से........


मैं यूँ ही बेवजह इतराता रहा
मैं यूँ  ही सदा मुस्कुराता रहा

भ्रम में था वोह मेरे अपने हैं ,
अपनों से भी ज़्यादा, वोह मेरे सपने हैं ,
उसके सपनों की डोर को सहलाता रहा,
स्वयं को सदा यूँ भरमाता रहा ।

मैं यूँ ही बेवजह इतराता रहा ,
मैं यूँ ही सदा मुस्कुराता रहा ।

मुकम्मल उसे करने की होड़ में रहा ,
अपने ही वजूद से जूझता रहा,
उसे जोड़ता रहा ख़ुद टूटता रहा,
द्रोण बन मैं उसमें, एकलव्य ढूँढता  रहा,
मैं ढूँढता रहा उसमें अपनेपन के निशां,
मैं ढूँढता रहा उसमें सभ्यता की ज़ुबां
बेवजह उसकी तल्ख़ियाँ सहेजता रहा,
उसे यूँ ही अपना बताता रहा ,

मैं यूँ ही बेवजह इतराता रहा,
मैं यूँ ही सदा मुस्कुराता रहा ।

न मैं ब्रह्मा-विष्णु , न ही मैं महेश ,
बस इन्सां ही रहने दो,न करो कोई क्लेश,
बेआबरू के भँवर में कसमसाता रहा ,
यही दुख मुझको बस सालता रहा,

मैं यूँ ही बेवजह इतराता रहा,
मैं यूँ ही सदा मुस्कुराता रहा ।

कमी कोई न थी दशरथ - महल में ,
कर्मठ - राह की न करते पहल वे ,
छत्रछाया वशिष्ठ की न आते यदि राम,
मर्यादा -पुरुषोत्तम न कहलाते वोह राम ।
आसमां की ऊँचाइयों में उसे ताकता रहा,
अक्स को उसके ,बुलंदियों में भाँपता रहा
घरौंदे मैं रेत के बनाता रहा ,
मैं ख़ुद को ही ख़ुद से झुठलाता रहा,

मैं यूँ ही बेवजह इतराता रहा ,
मैं यूँ ही सदा मुस्कुराता रहा ।

मसलों को मैं तेरे सुलझाता रहूँगा ,
कर्मठता की राह पर चलाता रहूँगा,
न तोड़ूँगा तुझसे नाता मैं अपना ,
मुद्दतों तक तुझे अपनाता रहूँगा  ।
मुद्दतों तक तुझे अपनाता रहूँगा ।

श्यामा शर्मा नाग

Saturday, 15 September 2018

आखिर क्यूँ......


हिंदोस्तान में रह कर भी ' हिन्दी - दिवस ' क्यों मनाएँ ?
क्यूँ अपने आप को यह जताएँ -
कि जोअपनी माँ है ,
वह बेगानी नहीं , अपनी है
हमें उसे अपननाना है ,
और देश को आगे बढ़ाना है ।

क्या हुआ जो लंगड़ा रही है,
फिर भी बेवजह मुस्करा रही है ,
हर गोद के हर आंचल को सहला रही है,
घर - घर को महका रही है ।

माना आर्थिक तंगहाली उसका नसीब है ,
फिर भी हर दिल के करीब है,
युगों से उस की दास्तां कुछ अजीब है,
नारी के जैसा उस का नसीब है।

बार - बार होते हैं  उस पर प्रहार
पर सोना तप के ही कुन्दन बनता है हर बार !!!

श्यामा शर्मा नाग

Thursday, 23 February 2017


कोशिश कर तू हल निकलेगा ,
आज नहीं तो कल निकलेगा 
कोशिश को तू ज़िंदा रख ,
खारे समंदर से भी 
गंगाजल निकलेगा । 

रो कर यूँ फ़रियाद न कर,
व्यर्थ समय बर्बाद न कर ,
कर्मठता की राह पकड़ कर ,
सपनों को आबाद तू कर ।
मेहनत तेरी रंग लाएगी ,
भाग्य तेरा भी बदलेगा ,
कोशिश कर तू हल निकलेगा ,
आज नहीं तो कल निकलेगा

माना काँटों से जीवन भरा हुआ है ,
तपती धूप से जला हुआ है ,
रेगिस्तान की मृग तृष्णा-सा 
एक बवंडर खड़ा हुआ है ।
सोच में पड़ मत ,बढ़ तू आगे 
यह आवरण भी अवश्य हटेगा 
कोशिश कर तू हल निकलेगा ,
आज नहीं तो कल निकलेगा

बन के अर्जुन ,रणभूमि का तू 
कर्मभूमि पे कौशल दिखा,
जीवन के हर पग पर तू ,
अपने हुनर का सबब सिखा 
रख तू यक़ीं अपने जौहर पर,
बंजर ज़मीं से भी फल निकलेगा ,
कोशिश कर तू हल निकलेगा 
आज नहीं तो कल निकलेगा

Saturday, 4 February 2017


VIEW

It is pitch dark outside
But there is always a glimmer of light
Thousands n lakhs obstacles on the way
But you have to fight

There is silver lining in the cloud
A very sharp and piercings all around
Your hard work will never go unheard
Persistently you have to make yourself proud

Have faith in God and work hard
Come what may never lower your guard
Move ahead whatever is the situation
Your eyes should be on your destination

Accept flow of life with a positive note
Do not be in a dilemma
Face every situation with a lasting hope

Failure is not the end of sight
Success is not the end of life
If winter comes spring can not be far behind
Do not lose your heart
God is very kind

Life is gold hold it as a pawn
You will see the light of dawn
You will see the light of dawn

Sunday, 11 December 2016

अरमान

मैं भी उड़ना चाहती हूँ
जीवन को जीना चाहती हूँ
माँ ही तो माध्यम थी मेरी
क्यूँ जग में आना पड़ा भारी
मेरे हिस्से की तूने ममता
क्यूँ दफ़न कर दी सारी की सारी

कोख में आ कर तेरी माँ
मैंने भी सपने सँजोए थे
मेरे भी कुछ अरमां थे
राह में मेरी
क्यूँ काँटे ही बोए थे
तेरे आँचल की छाया में
हारसिंगार न बन पाई मैं
दुनिया में आकर भी तो
भरपूर दुलार न ले पाई मैं

वक़्त की धार पर सदैव
होता रहा मेरा इम्तिहां
सहती आई हूँ सदियों से
ख़ौफ़ है मेरे सितम की दास्ताँ

सीता सती सावित्री बनकर
अग्नि परीक्षा से गुज़री हूँ मैं
कसौटी पर वक़्त की फिर भी
खरी नहीं उतरी हूँ मैं

रावण शकुनि दुशासन के चक्रव्यूह में अभी भी जीती हूँ
जी कर मरना , मर कर जीना
विष का प्याला पीती हूँ

लड़ कर उन से भी न हूँगी मैं यूँ बेहाल
वक़्त के गर्भ से निकलेगा एक सवाल
जब जब ज़ुल्म होंगे नारी पर
थर्रा उठेगा महाकाल

जिसने जीवन दिया इस जग को
उसका यूँ अपमान है क्यूँ
उसके सपनों को बेबस करके
नर तू बना हैवान है क्यूँ  ?
???????

श्यामा