Sunday, 11 December 2016

अरमान

मैं भी उड़ना चाहती हूँ
जीवन को जीना चाहती हूँ
माँ ही तो माध्यम थी मेरी
क्यूँ जग में आना पड़ा भारी
मेरे हिस्से की तूने ममता
क्यूँ दफ़न कर दी सारी की सारी

कोख में आ कर तेरी माँ
मैंने भी सपने सँजोए थे
मेरे भी कुछ अरमां थे
राह में मेरी
क्यूँ काँटे ही बोए थे
तेरे आँचल की छाया में
हारसिंगार न बन पाई मैं
दुनिया में आकर भी तो
भरपूर दुलार न ले पाई मैं

वक़्त की धार पर सदैव
होता रहा मेरा इम्तिहां
सहती आई हूँ सदियों से
ख़ौफ़ है मेरे सितम की दास्ताँ

सीता सती सावित्री बनकर
अग्नि परीक्षा से गुज़री हूँ मैं
कसौटी पर वक़्त की फिर भी
खरी नहीं उतरी हूँ मैं

रावण शकुनि दुशासन के चक्रव्यूह में अभी भी जीती हूँ
जी कर मरना , मर कर जीना
विष का प्याला पीती हूँ

लड़ कर उन से भी न हूँगी मैं यूँ बेहाल
वक़्त के गर्भ से निकलेगा एक सवाल
जब जब ज़ुल्म होंगे नारी पर
थर्रा उठेगा महाकाल

जिसने जीवन दिया इस जग को
उसका यूँ अपमान है क्यूँ
उसके सपनों को बेबस करके
नर तू बना हैवान है क्यूँ  ?
???????

श्यामा

Friday, 11 November 2016

सपने .....,,..

जब उदास मन हो
और सोच पे बंधन हो
भावनाएँ भी साथ न दें
संवेदनाएँ पलट कर जवाब न दें

उस वक़्फ़ पे
सोच की रफ़्तार को
जनून की हद तक ले चल
वक़्त की पतवार पे बहता चल
हवा-सा तू बहने दे
फूलों -सा महकने दे
श्रृंगार -सा सँवरने दे
बच्चों - सा मचलने दे
सोच को अंजाम देते हैं ये
तभी तो सपने कहलाते हैं ये

ख़ुदगर्ज़ी से दूर
हक़ीक़त से भरपूर
ज़िंदगी के ये नूर
घुँघरू -सी झँकार सुनाते हैं ये
तभी सतरंगी दुनिया के
अठरंगी सपने कहलाते हैं ये

श्यामा

Tuesday, 17 May 2016

वेदना भीष्म की ........


सबके अंदर एक भीष्म है
जो प्रतिज्ञाबद्ध है
प्रभाव डालते हैं समय और परिस्थितियाँ
तिस पर भी वह आबद्ध है
कुरुक्षेत्र का रण हो
या भावों का क्षण हो
शरों की शय्या पर
पड़ता है भीष्म आहत
प्रतीज्ञाबद्ध होने के भी बावत
अपने से ही अपना प्रश्न करता है बार बार
पाया क्या इस दुनिया में आकर
माँ का वचन निभाकर
अपनों ने अपनों को तोड़ा
निज सुविधा से सबने जोड़ा
क्या यही इति थी इस जीवन की
उस पर यह नर संहार
करता है वह अपने से
यही प्रश्न बार बार
जिजीविषा अदम्य थी
पाँव में बेड़ियाँ बंधी थीं
खुलकर जीने की इच्छा
घुट गई अंदर ही अंदर
भावों का समंदर था
तिमिर अति गहन -सा था
उस पर पल पल का प्रहार
करता है वह अपने से
यही प्रश्न बार बार



श्यामा

Tuesday, 26 April 2016

सपने........


जब उदास मन हो
और सोच पे बंधन हो
भावनाएँ भी साथ न दें
संवेदनाएँ पलट कर जवाब न दें

उस वक़्फ़ पे
सोच की रफ़्तार को
जनून की हद तक ले चल
वक़्त की पतवार पे बहता चल
हवा-सा तू बहने दे
फूलों -सा महकने दे
श्रृंगार -सा सँवरने दे
बच्चों - सा मचलने दे
सोच को अंजाम देते हैं ये
तभी तो सपने कहलाते हैं ये

ख़ुदगर्ज़ी से दूर
हक़ीक़त से भरपूर
ज़िंदगी के ये नूर
घुँघरू -सी झँकार सुनाते हैं ये
तभी सतरंगी दुनिया के
अठरंगी सपने कहलाते हैं ये

श्यामा

Thursday, 31 March 2016

न कर कोई ग़म ...........

तू उम्मीद भी किए जा , सजदा भी किए जा,
उसके रहम की दुआ भी किए जा,
ठोकरें जितनी भी मिलें -
इरादे कड़े किए जा ।
ग़र सपने सब न हों पूरे , बेशक हों कम
उस पल भी मेरे दोस्त ! न कर कोई ग़म 

जीवन के रास्ते नहीं होते सरल ,
मुश्किलातों से भरे हुए हैं सब पल ,
ज़िंदगी जब सरल कम ,टेढ़ी लगे ज़्यादा ,
करके भी कोई न पूरा करे वादा ,
जब नम हों आँखेंभरा हो मन ,
उस पल भी मेरे दोस्त ! न कर कोई गम । 

जब उजली धूप अपने हिस्से की भी न मिले
चाँदनी कट छट भी न खिले
पूनम का चाँद हो या अमावस की रात ,
ज़िंदगी चलती रहे न रुके कोई बात ,
जब आँसुओं से भी भीगा हो तेरा दामन ,
उस पल भी मेरे दोस्त ! न कर कोई गम ।


श्यामा शर्मा नाग


           एक उम्मीद ,एक किर       
    

बनता बिगड़ता वोह खूबसूरत चेहरा ,
 लगने लगा जैसे खुदा हो गया बहरा 
चेहरे पर दिखी बेझिझक मुस्कान ,
ले गया सब कुछ  आया इक तूफान 

बह गया वोह घर​, वो कूचेवो गलियार​,
विकराल प्रलय था निगलने को तैयार
अभी तो माँ की गोद थी भरी,कब हो गयी सूनी
सोचा  होगा किलकारियाँ , सब दब जाएंगी यूँ ही 

एक सैलाब था इधर , एक था उधर ,
जिंदगी कुछ पल के लिए थी गयी ठहर 
सो जा मुन्नेसाहिल की तलाश है मुझे,
कुछ पल की बात हैभरपूर जिन्दगी दूंगी मैं तुझे 

माँ की साँस रुक गयी बच्चे को उठाए ,
ढूँढ रही थी जिंदगी बचा कोई उपाय 
लम्हा दर लम्हा बच्चा फिसलता गया ,
माँ की गोद छोड़ , लहरों में बहता गया 

आज ,जब भी मैं तन्हा होती हूँ , दिखती है वही मुस्कान ,
सोचती हूँ सर्जनहार​, तू बन गया कैसे हैवान ।
 जब भी गुनगुनाती हूँ  -
अपने अश्कों में तेरा ही चेहरा पाती हूँ 

मैं मुत्तमयन हूँ , वोह सुबह आएगी कभी,
इल्तिज़ा है मेरी तुझसे यही-
 खफ़ा होना तुम हमसे कभी -
कहर  ऐसा बरसाना कभी - 
दुआएँ  तेरी रहें हमारे साथ सभी  -

श्यामा

Wednesday, 30 March 2016

                          सोच

अँधेरा  गहराया 
वारिश की नन्हीं बूँद 
सहसा उछली
और बोली 
सुनो 
हँसोगे खेलोगे 
तो दुनिया में हैं रँग 
नहीं तो दुख तुम्हारे संग 
मैं भी तो टूटी हूँ 
अपने संम्पूर्ण से 
ठेला है बाधाओं को 
तो दिया सहारा ज़मीं ने 
तारा टूटता है
तो सौभाग्य हमारा जुड़ता है 
फिर क्यों हो तुम हताश 
जब ज़िंदगी है तुम्हारे पास 
जब हौसले हों बुलंद
और मन में हो विश्वास 
तब लक्ष्य तुम्हारे पास 

आओ कुछ एेसा कर दिखाएँ

आओ कुछ ऐसा कर दिखाएँ ,इक नया सपना सजाएँ ।
जहाँ से चलें जहाँ तक चलें,  शिद्दत से बढ़ें शिद्दत से चढ़ें ,
ग़र काफि़ला ख़्वाबों का हैहथियार जंग​ को बनाएँ ,
इक नया सपना सजाएँ ।

परिस्थितियाँ हों अनुकूल तो मजा़ ही क्या 
ज़न्नत हो सब फिर वजह ही क्या 
ग़र मँज़िलें हैं दूर तो क्या,फासलों को अब मिटाएँ
रावण नहीं,राम को लाएँ,इक नया सपना सजाएँ I 

समय की चुनौती पर न हो हैरान​,अपने किए पर न हो पश्यमाँ ,
ग़र रात है काली तो न घबराएँ ,उजाले सुबह के भी ढूँढ लाएँ,
इक नया भारत बनाएँ ,आओ कुछ ऐसा कर दिखाएँ,
इक नया सपना सजाएँ

तमन्नाओं की कशमकश में ग़र समन्दर के भँवर में ,
ढूँढने मोती कोबस किनारे तक न जाएँ ,
मुद्दा युगों का नहीं यहाँ पर​अपना हर पल बनाएँ,
इक नया सपना सजाएँ ।

मुद्दतें हो गईं यहाँ पर​सपने सँजोते सँजोते ,
झँझावातों के भँवर मेंन रह पर के भरोसे ,
जज़्बा है तो कर गुज़र ...........
इक आग-साइक शोला-सादे हवा उसको तू बढ़ कर​
तोड़ तारे आसमाँ केहम ज़मीं पर ले ही आएँ ।
आओ कुछ ऐसा कर दिखाएँइक नया भारत बनाएँ ।

कोई तो रास्ता ज़रूर निकलेगा ...........
 

म॑ज़िलें दूर हैं तो क्या हुआ
रास्ते बामुश्किल हैं तो क्या हुआ,
हवाओं के रुख  बदले तो क्या हुआ,
उगता सूरज अन्धेरों को चीरता दिखेगा,
कोई तो रास्ता ज़रूर निकलेगा

मत कोस उस दर्द की अन्धेरभरी रात को,
जिस्म  दिल पर पड़े उस आघात को ,
अक्स उनके ज़हन से तू मिटाने की बातकर ,
 झंझोड़ दिलो -दिमाग कोबस उम्मीदकी बात कर
इस जहां के शोर में भी भाव तेरा निखरेगा ,
कोई तो रास्ता ज़रूर निकलेगा 

प्रतिशोध से  बन पाया  कभी कोईमहान ,
फ़िदा उसी पर हुई ज़िन्दगी , खुदा रहा उसपर मेहरबाँ ,
फ़ना होकर  किया कभी मानवता काप्रतिकार​,
 छेड़े कभी किसी की संवेदनाओं के तार​,
सोच मत इस भंवर से तू अवश्य निकलेगा,
 कोई तो रास्ता ज़रूर निकलेगा