Wednesday, 30 March 2016


आओ कुछ एेसा कर दिखाएँ

आओ कुछ ऐसा कर दिखाएँ ,इक नया सपना सजाएँ ।
जहाँ से चलें जहाँ तक चलें,  शिद्दत से बढ़ें शिद्दत से चढ़ें ,
ग़र काफि़ला ख़्वाबों का हैहथियार जंग​ को बनाएँ ,
इक नया सपना सजाएँ ।

परिस्थितियाँ हों अनुकूल तो मजा़ ही क्या 
ज़न्नत हो सब फिर वजह ही क्या 
ग़र मँज़िलें हैं दूर तो क्या,फासलों को अब मिटाएँ
रावण नहीं,राम को लाएँ,इक नया सपना सजाएँ I 

समय की चुनौती पर न हो हैरान​,अपने किए पर न हो पश्यमाँ ,
ग़र रात है काली तो न घबराएँ ,उजाले सुबह के भी ढूँढ लाएँ,
इक नया भारत बनाएँ ,आओ कुछ ऐसा कर दिखाएँ,
इक नया सपना सजाएँ

तमन्नाओं की कशमकश में ग़र समन्दर के भँवर में ,
ढूँढने मोती कोबस किनारे तक न जाएँ ,
मुद्दा युगों का नहीं यहाँ पर​अपना हर पल बनाएँ,
इक नया सपना सजाएँ ।

मुद्दतें हो गईं यहाँ पर​सपने सँजोते सँजोते ,
झँझावातों के भँवर मेंन रह पर के भरोसे ,
जज़्बा है तो कर गुज़र ...........
इक आग-साइक शोला-सादे हवा उसको तू बढ़ कर​
तोड़ तारे आसमाँ केहम ज़मीं पर ले ही आएँ ।
आओ कुछ ऐसा कर दिखाएँइक नया भारत बनाएँ ।

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