कोई तो रास्ता ज़रूर निकलेगा ...........
म॑ज़िलें दूर हैं तो क्या हुआ,
रास्ते बामुश्किल हैं तो क्या हुआ,
हवाओं के रुख न बदले तो क्या हुआ,
उगता सूरज अन्धेरों को चीरता दिखेगा,
कोई तो रास्ता ज़रूर निकलेगा
मत कोस उस दर्द की अन्धेर- भरी रात को,
जिस्म औ दिल पर पड़े उस आघात को ,
अक्स उनके ज़हन से तू मिटाने की बातकर ,
न झंझोड़ दिलो -दिमाग को, बस उम्मीदकी बात कर
इस जहां के शोर में भी भाव तेरा निखरेगा ,
कोई तो रास्ता ज़रूर निकलेगा ।
प्रतिशोध से न बन पाया न कभी कोईमहान ,
फ़िदा उसी पर हुई ज़िन्दगी , खुदा रहा उसपर मेहरबाँ ,
फ़ना होकर न किया कभी मानवता काप्रतिकार,
न छेड़े कभी किसी की संवेदनाओं के तार,
सोच मत इस भंवर से तू अवश्य निकलेगा,
कोई तो रास्ता ज़रूर निकलेगा ।
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